Friday, October 7, 2011

चर्चे  हमारे  आजकल  आम  हो  गए   हैं
हम मुफ्त में, बिन कुछ किये बदनाम हो गए हैं.....
 
झूठे  अफसाने  बयाँ  कर  रहे  हैं  लोग 
सच,खुद को करने में हम, नाकाम हो गए हैं

इक नज़र भर के देख लिया उनको जो हमने,
उस  दिन  से  वो  बेहद  परेशान  हो  गए  हैं ..

सोचीं ना थीं जो बातें, कभी हमने ख्वाबों में,
मन में दबे-दबे से अब वो, अरमान हो गए हैं...

अब  जो  गुज़रते  हैं   कभी  सामने  से वो,
जान कर भी बिलकुल अनजान हो गए हैं...

बर्दाश्त नहीं हो रही अब उनकी बेरुखी,
अब तो वो मेरी मौत का, सामान हो गए हैं....

 


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  2. Bahut achha likha hai Roli ji...jis ke liye bhi likha hai...;))))

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  3. Thank you so much to all of you my dear friends....

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