Saturday, February 25, 2012

परम्पराएँ........

अलसुबह सूर्य को
अर्घ्य देते हाथ
अब नहीं दिखते.....

देहरी पे देते ऐपन,
उसे सजाते हाथ
अब नहीं दिखते....

आँचल खींच
घूँघट सँवारते हाथ
अब नहीं दिखते

उन के गोले-सलाइयों में
उलझे हाथ
अब नहीं दिखते.....

सूर्य को नमन का,
अब समय नहीं,
देहरी पर संगमरमर
लग गया है,

साड़ी का पल्ला
कंधे पर ही टिक नहीं पाता,
उन के गोले व् सलाइयाँ
अब इतिहास की बातें हुयीं....

-रोली...

7 comments:

  1. बहुत सही लिखा है आपने ...

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  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

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  3. शब्द और भाव का अदभुद सामंजस्य .....बहुत सारगर्भित रचना!

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  4. बिल्कुल सही कहा………सुन्दर प्रस्तुति हकीकत बयाँ करती।

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  5. सचमुच समय बहुत बदल चुका है।

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    1. राज जी, सुषमा जी, यशवंत जी, संजय जी, वंदना जी , इंडियन जी ...आप सभी का बहुत बहुत आभार......

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