Monday, February 20, 2012

सुरमई सांझ ढलते ही,
देहरी का दीपक जलते ही,
करके सोलह सिंगार तुम,
मन-मंदिर में आ जाना......

पहन लेना सारे जेवर,
ओढ़ लेना लाल चूनर,
सजा के रोली माथे पे ,
मन-मंदिर में आ जाना.....

लगा के अधरों पे लाली,
पहन के कानो में बाली,
चल कर चाल मतवाली ,
मन-मंदिर में आ जाना....

सजा कर नैनों में काजल ,
केशों में  गूंथ कर बादल,
बाँध कर पाँव में पायल,
मन-मंदिर में आ जाना....

 



  

5 comments:

  1. बहुत ही मनोहारी रचना है वासंतिक श्रृंगार किये।

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  2. वाह! बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

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  3. Replies
    1. संगीता जी, सुषमा जी, वंदना जी....एवं...(?) .. बहुत-बहुत धन्यवाद

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