Wednesday, March 16, 2011

कैसा है ये युग पाषाण.....
स्वभाव कठोर...
ह्रदय पत्थर..
शून्य संवेदनाएं ..
मृत भावनाएँ...
मन अचेत...
मानव निष्चेत,
इच्छाएं अनंत,
जीवन परतंत्र...
बुझे नयन,
क्षीण तन-मन...
मस्तिष्क में तनाव,
रिश्तों में चुभन,
भावना स्वार्थ की,
मृत्यु परमार्थ की,
मृत्यु यथार्थ की,
कैसा है यह युग पाषाण...
कैसा है ये युग पाषाण....

-रोली....

2 comments:

  1. युग पाषाण हो न हो इंसान ज़रूर पाषाण हो गया है ...अच्छी अभिव्यक्ति

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  2. धन्यवाद संगीता जी....
    .इन्सान ने ही इस युग को पुनः पाषाण युग बना दिया है.....

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