Monday, August 6, 2012

 ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
इन खूबसूरत तेरी आँखों में दर्द के मंज़र हम देखते हैं,
तेरे कतरा-कतरा आँसू में सैलाब-ए-समंदर हम देखते हैं
~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

ना जाने क्यों वो खुद से खफा-खफा रहता है
भीड़ में भी अपने साये तक से जुदा रहता है
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

उसकी बेरुखी पर कितनी बार रूठ जाती हूँ
उसे तो परवाह नहीं, खुद ही खुद को ही मनाती हूँ
___________________________________

1 comment: