Monday, September 10, 2012

मसखरा प्रेम....

पूछती हूँ मै तुमसे -
कब रेत में रगींन  फूल खिलेंगे ..!!!
कहते हो तुम  -
जब पानी में हम-तुम  मिलके शब्द लिखेंगे ...
सोचती हूँ
कब सितारे टूट कर आँचल में गिरेंगे ..!!!
कह देते हो -
चाँद-सूरज जब कभी फलक पर मिलेंगे ...
पूछती हूँ -
क्या बादल बरसेंगे जेठ महीने में......!!!
कहते हो तुम -
पूस में इस बार रगीं टेसू खिलेंगे ....
कहती हूँ मै -
देखना है इंद्रधनुष को छत पर उतरा ...
हँसते  हो तुम-
देख लेना अपनी चूनर को छत पर बिखरा ...
नाराज़ हूँ मै -
कुछ भी कहते हो , ये भी कोई बात हुई .....!!!
खिलखिला उठते हो तुम -
"प्रेम में है..हर बात सही ...हर बात सही।"

- रोली ..

8 comments:

  1. Prem mein har baat sahi..har baat sahi...Waah Waah !!!

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  2. प्रेम में उलट पुलट जाते हैं मौसम सारे !

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    1. सत्य कहा आपने .....
      धन्यवाद "वाणी-गीत"

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  3. प्रेम का मसखरा रूप अच्छा लगा।


    सादर

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  4. प्रेम की हर बात ऐसी हो होती है ...
    ये चुहल प्रेम की सांस है ... बहुत खूब ...

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    1. दिगंबर जी.....बहुत-बहुत धन्यवाद |

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